21.12.07

शाश्वत गीत

यदि आप इस रचना को हिन्दी में नहीं पढ़ पा रहे हैं , तो कृपया devLys 10 फॉण्ट download करें. download के लिए कृपया इस लिंक को कॉपी कर ब्रॉउज़र में पेस्ट करें http://www.gbpuat.ac.in/Hindifonts.htm

-

शाश्वत गीत

vks ç—fr ds xhr

rw bruk vdsyk D;ksaaa]

vks v/kwjs jkx u gks ik;k iwjk D;ksa A

;k v/kwjkiu rsjh iw.kZrk dk eku gS

;k lef"V ds :i esa ;g fnO;rk dk xku gS

;k Lo;a ,d :i cuuk gS ugha mÌs’; rsjk

ek= bd vkHkkl gS tks [kkst ys rw gS mlh dk]

;k fd dsoy rw mls nsrk uohu izdkj gS

ढूंढ ys tks pkfg, vkdkj ek= fopkj gS]

vks izd`fr ds xhr rw bruk vdsyk D;ksaaa

ckaV ys eq>ls u gksosa iw.kZ ge rqe D;ksaA

xkSjo vxzoky

ojgaurav@gmail.com

सड.क संकेत Road Signs

सड. पर चलते हुए हमें कुछआवश्‍यक संकेतों के बारे में पता होना चाहिए

18.12.07

एटम बॉम्ब और पांथिक विश्वास

April 18, 2007 12:58:00 PM Tags: एटम बॉम्ब और पांथिक विश्वास अभी अखबार में पढा् कि ईरान के एटम बॉम्ब बनाने की खबरों के कारण सुन्नी मुस्लिम देशों में बडी् उत्तेजना है, सभी अब यह चाहते हैं कि पाकिस्तान सुन्नी मुस्लिम देशों का नेतृत्व करते हुए अपने यहाँ परमाणु बॉम्ब की तैनाती करे। सउदी अरब ने भी इसी प्रकार के प्रयास प्रारम्भ कर दिये हैं। सवाल उठता है कि हम किस दुनिया में रह रहे हैं। क्या हम यह समझते भी हैं कि उत्तेजना के क्षणों में हम जो बात कह रहे हैं उसे हम बाद में संभाल भी पाएँगे या नहीं। क्या हमारी अंतर्राष्ट्रीय राजनीति भी क्या अब पांथिक विश्वासों पर ही चलेगी। क्या उन देशों की जनता की आन्तरिक इच्छा भी यही है। हम शिया, सुन्नी, कैथोलिक-प्रोटेस्टेण्ट आदि आदि से हम क्या हासिल करना चाहते हैं। क्या शासन के जनता के प्रति शेष सारे कर्तव्यों की इति हो चुकी है, जो अब वह इस तरह 'टाइम पास' करने के तरीके खोज रहा है। मनबहलाव व जनता के पांथिक अहम की तुष्टि (जिसे आजकल धार्मिकता के अर्थों में हम प्रयोग करते हैं) को बन्द करना ही चाहिए। तुष्टीकरण एवम् मूर्खता के युग को अब समाप्त होना ही चाहिए।

प्रेम

प्रेम के साथ सबसे बडी् समस्या यह है कि यह जिसके साथ है उसे बाँधने की कोशिशें प्रारम्भ हो जाती हैं। परंतु सत्य यह है कि किसी को भी इस प्रकार आप बॉंध पायें यह संभव ही नहीं होता। प्रसिद्ध कहावत है कि यदि आप किसी से प्रेम करते हैं, तो उसे स्वतंत्र छोड़ दीजिए। अगर वह आपका है तो आपके पास वापस आ जाएगा, और यदि वह नहीं आता तो वह आपका कभी था ही नहीं। परन्तु समस्या यह होती है कि हम उसे यह मौका देते ही नहीं कि वह हमसे बाहर भी कुछ सोच सके। एकमेव अधिकार ही हमारी प्र‍वृत्ति बन जाती है। यही प्रेम के प्रति हमारे आकर्षण को धीरे-धीरे कम और फिर समाप्त करने लगती है। प्रसिद्ध कहावत भी है कि जिस भी चीज को जान लिया जाए उसके प्रति हमारा विक्षिप्त आकर्षण फिर कम होने लगता है। यानी ज्ञान की पूर्णता लक्ष्य ज्ञान के प्रति अरुचि उत्पन्न करती है। प्रेम के बारे में एक और भी महत्वपूर्ण विषय है कि प्रेमी पहले आकर्षण, फिर सहज, फिर अन्त में आदत बन कर रह जाता है। प्रेम की कोमल भावनाएँ समाप्त प्राय हो जाती हैं। तो क्या प्रेम के आनन्‍द को आजीवन महसूस करना संभव नहीं। है! बस प्रेम में नवीनता बनाये रखिये। उसे आदत न बनने दें। ध्यान रखें प्रयत्न उसे नीरस होने से बचा लेते हैं। उसे वैसे प्रयत्न देते रहिये जो आप उसे उसकी नवीनता में समर्पित किया करते थे। प्रेम आपको सबसे मूल्यवान अनुभव देने में सहज समर्थ होगा। प्रेममयी शुभकामनाओं के साथ..... गौरव ।

सुधार

एक पिता ने अपने पुत्र को भी मूर्तिकला सिखाई। दोनों हाट में जाते और अपनी-अपनी मूर्तियॉं बेच कर आते। पिता की मूर्ति डेढ्-दो रूपये में बिकती, पर बेटे की मूर्तियों को आठ-दस आने ही मिलते। हाट से लौटने पर बेटे को उसका पिता उसकी मूर्तियों में कमियाँ बताता। बेटा अपने पिता की सलाह अनुसार ही काम भी करता। यही क्रम वर्षों चलता रहा। कुछ समय बाद बेटे की मूर्तियाँ भी पिता जितना मूल्य पाने लगीं। पिता ने भी उसी प्रकार शिक्षा प्रारंभ रखी। बेटा भी सुधार करता रहा। कला में निखार आता गया। मूर्तियाँ अब 5-6 रूपये में बिकने लगीं। परंतु पिता के उपदेशों का क्रम न टूटा। बेटा भी सीखता रहा। एक दिन झुंझुलाकर बेटे ने कहा 'मेरी मूर्तियाँ अब 5-6 रूपये में बिकती हैं जबकि आपकी डेढ्-दो रूपये में। कला भी मेरी आपसे अच्छी हो गयी है, अब तो मेरी कला में से दोष निकालना बन्द कीजिए।' पिता बोले - 'जब मैं तुम्हारी उम्र का था तो मुझे भी अपनी कला का अहंकार हो गया था, परिणाम यह कि मैंने अपनी कला में सुधार बंद कर दिया। तब से मेरी प्रगति रुक गयी और में दो रूपये से अधिक की मूर्तियाँ नहीं बना सका। मैं चाहता हूँ कि ऐसी भूल तुम न करो। अपनी त्रुटियों को समझने और सुधारने का क्रम जारी रखो, ताकि बहुमूल्य मूर्तियाँ बनाने वाले श्रेष्ठ कलाकारों की श्रेणी में पहुँच सको।

आमन्त्रण

वह क्‍या चीज है जिसे मनुष्‍य जीवन में सर्वाधिक महत्‍व देता है। पैसा, सम्‍मान, प्रेम, अधिकार या कुछ और। मनुष्‍य वास्‍तव में मनुष्‍य की भाँति ही व्‍यवहार करता है या उसे ऐसा करना चाहिए। बाहर से नर्म और अन्‍दर से मूल्‍यों सा कठोर। मनुष्‍य में ऐसा ही तो होता है। बाहर त्‍वचा का कोमल भाव और अन्‍दर हड्डियों की कठोरता। ऐसा हो तो जीवन बड़ा मनोहर बन जाता है। ऐसा ही होना जीवन की सुन्‍दरता भी है। प्रश्‍न था कि मनुष्‍य वास्‍तव में चाहता क्‍या है- ध्‍यान से देखें तो पायेंगें कि मनुष्‍य के जीवन में सन्‍तुलन है और यही वह वस्‍तु है जिसे वह घूम फिर कर भाँति- भाँति से स्‍पष्‍ट क‍रता है और उसकी इच्‍छा करता है। धन-सम्‍मान-सम्‍पर्क-शारीरिक स्‍वास्‍थ्‍य आदि ये सभी बल हैं और इन सब का श्रेष्‍ठ सन्‍तुलन ही जीवन का आनन्‍द भी है। इनमें से जो भी पक्ष कमजोर रह जाए, उसे सबल बनाने का प्रयास करना ही चाहिए और इस प्रयास में सहयोग, समाज के होने की आवश्‍यकता और औचित्‍य दोनों ही हैं। आइये हम भी ऐसे सहयोगी व औचित्‍यपूर्ण समाज बनें। What is the thing a person gives most importance to his life? Money, Honor, Love , Authority or something else? Actually, Human behaves like human is or we can say ‘he/she should behave like that’. Soft from outside but hard from outside like values. Actually, human has the same thing. A soft feeling of skin outside and bone’s hardness inside. If it will be happen life turns into unmatched beauty. This is the basic aim of life too. The Question was what human wants? If we concentrate, we shell get that there is balance in Human life and that is the thing which he shows by many ways and desires. Money, Honor, contacts, good health etc., these all are power or strength. And their good balance is the key of ideal life . This generates the no ending pleasure for life. Whatever aspect which remain weaker in those, should be try to make that strong. The cooperation in that is the cause and reason of society . Let us be part of such cooperative and reasonable society.

श्री रामसेतु

श्री रामसेतु श्री रामसेतु का विषय अब उतना अनजाना नहीं रहा, जितना कि कुछ वर्ष पूर्व हुआ करता था। हिन्‍दू जिनके आराध्‍यदेव ही श्री राम जी हैं, वे भी इस विषय में इतने चैतन्‍य पहले नहीं रहे थे। कई बार होता भी है कि जब कोई वस्‍तु हाथों से जाने लगती है तब कहीं जाकर उसके महत्‍व का आभास होता है। नहीं तो अब तक ऐसा कब हुआ कि, जैसे छोटे-छोटे प्रसंगों से जुडे. स्‍थल तीर्थ बन गये और उनसे सम्‍बन्धित यात्राऍं आयोजित होने लगीं, वैसे ही कोई यात्रा रामेश्‍वरम् से लंका तक भी होती। खैर यह विषय धार्मिकों के लिए तो दु:ख का हो सकता है परन्‍तु धर्म के स्‍वरूप के लिए अनिवार्य नहीं। महत्‍वपूर्ण यह है कि भारतीय सरकार को ऐसा एकदम क्‍या हुआ कि यह इतना पुराना मानव एवम् प्राकृतिक इतिहास को समेटे हुआ यह पुल उन्‍हें एकदम से अमहत्‍वपूर्ण प्रतीत होने लगा। बजाय इसके कि लंका से अपने सम्‍बन्‍ध मजबूत करने के लिए वह स्‍वत:निर्मित इस पुल का पुनरुद्धार करवाती और भारतीयों और लंकावासियों के लिए व्‍यापार, संस्‍कृति के नये द्वार खोलती वह श्रीलंका की तमाम आपत्तियों के बाद भी इसे तोड.ने के लिए इतनी उतावली हो गयी। इस पर भी खास बात यह कि विश्‍वभर के प्रमुख वैज्ञानिक इस सेतुध्‍वंस के व्‍यापक प्राकृतिक, सामरिक, सीमायी हानियों के बारे में लगातार सचेत कर रहे थे। जब कोर्ट में इसे रुकवाने के लिए याचिका दायर की गयी तो उन श्रीराम‍जी को जिनसे भारतवंशी विश्‍वभर में अपने वंश को जोड़.ते हैं, उनके बारे में ही अपमानजनक टिप्‍पणियॉं सरकारी विभाग द्वारा की गयीं। विरोध का ऐसा अनुमान सरकार को नहीं रहा होगा अत: विरोध के प्रचंड रूप को देखते ही टिप्‍पणियों पर क्षमा मॉंगने के साथ ही ‘क्षतिपूर्ति’ के प्रयास प्रारम्‍भ कर दिये गये। हालांकि सरकार पुल के तोड़ दिये जाने के अपने निर्णय पर दृढ़ है। यद्यपि फिलहाल तो मा. न्‍यायालय ने ही तोड.-फोड. के विरुद्ध स्‍थगनादेश जारी कर दिया है। इन सब बातों और घटनाक्रम के बारे में समाचारों में बहुत कुछ आ चुका है परन्‍तु इन सबसे परे चिंतनीय बात यह है कि तमाम विकल्‍पों और व्‍यापक जनभावनाओं के बाद भी इस प्राचीन सेतु को तोड.ने के लिए सरकार का ऐसा दुरा्ग्रह क्‍यों है ? इसके संदर्भ में हम एक भिन्‍न तथ्‍य देखें। हम जानते हैं कि तमिलनाडु के ‘द्रमुक’ दल का स्‍थापना के समय से ही श्रीराम से विरोध अब तक जीवन्‍त रहा है। वहीं दिल्‍ली में बैठ कर सरकार चला रहे कॉन्‍वेन्‍ट स्‍कूलों में पढ़े. और अंग्रेजी में सोचने वालों की निगाह में इस देश का पुराना धर्म और उसकी पुरानी मान्‍यताऍं देश के निवासियों के लिए नितान्‍त अनावश्‍यक हैं। सम्‍भवत: देश की तरक्‍की इस के बिना उन्‍हें सम्‍भव भी नहीं लगती हो; उस पर वाममार्गी हैं ही, जो धर्म को अफीम से भी बढ. कर मानते हैं और शेष में समाजवादी, जिनकी सद्भावना भी रामजी और श्रीरामसेतु के लिए नहीं लगती। अब इस सेतु के तोडे. जाने को वोट की राजनीति के साथ ही 1857 की क्रान्ति के समय के तात्‍कालिक कारण से भी जोडें.। उस समय एनफील्‍ड रायफल के कारतूस के बारूद को नमी से बचाने के लिए उस पर गाय और सूअर की चर्बी से युक्‍त कागज उन कारतूसों पर लगाया गया था, जिसे कि भारतीय हिन्‍दू और मुसलमान सिपाहियों को दॉंतों से काटना होता था। गाय हिन्‍दू/आर्य के लिये ‘मइ्या’ है तो सूअर मुसलमान के लिए पवित्र। मुँह में इनका मॉंस कैसे लिया जाए? फिर या तो विद्रोह होगा या फिर चुपचाप जातीय चेतना का ह्रास सहना होगा। यदि यह युक्ति सरलता से स्‍वीकार कर ली जाए तो फिर तो भारतीयों पर से धर्म का बन्‍धन भी हट जाए और सहजता से धर्मपरिवर्तन, सेनाओं का विदेश भेजना (जो उस समय हिन्‍दू धर्म में धर्मविरुद्ध माना जाता था) या अन्‍य मनोनुकूल कार्य भी सरलता से सम्‍पन्‍न करवा लिए जाऍं। या‍नी आस्‍था के मर्मस्‍थलों को चोट पहुँचा कर धर्म की जीवनी शक्ति को कमजोर किया जाए ताकि प्राचीन धर्म व परम्‍पराओं की डोरियॉं कमजोर पड. जाएँ और देश ‘आधुनिक प्रगति’ और अन्‍तरराष्‍ट्रीय बाजार के लिए पूरी तरह अनुकूल हो जाए। ऐसा सोचना नितान्‍त नाजायज भी नहीं लगता। जब आर्थिक दृष्टि से सेतु काटने को अलाभकारी सिद्ध किया जा रहा है; रक्षा के हिसाब से भी खतरनाक बताया जा रहा है; समुद्री जीवन और पारिस्थितिकी के मापदण्‍ड पर भी यह खतरनाक है, ऐसा विशेषज्ञ कह रहे हैं; हजारों मछुआरे भी अपनी धार्मिक भावनाओं के साथ ही अपने आर्थिक जीवन के विनाश की आशंका से इसका विरोध कर रहे हैं; सीमाओं की असुरक्षा की बात भी कही जा रही है और तो और स्‍वयम् श्रीलंका इसे तोडे. जाने का विरोध कर रहा हो तो सवाल यह है कि इसे तोड़ा क्‍यों जा रहा है। कहीं ऐसा तो नहीं कि सर्वेश्‍वरों की कृपाप्राप्ति की अभिलाषा में कुछ ‘सेकुलर’ बेवजह ही इसे किये पर किये जा रहे हों। कुछ भी हो जैसे बामियान और बलूचिस्‍तान में तोड़ दी गयीं अनुपम बुद्धदेव की विशाल प्रतिमाऍं अब लौट नहीं सकती, वैसे ही यह श्री रामसेतु भी टूटकर फिर नहीं बनने वाला। अनुपम ऐतिहासिक, धार्मिक, प्राकृतिक विरासत के रूप की इसकी प्रतिष्‍ठा फिर कोई नहीं लौटा पाएगा। उस स्‍वर्णिम इतिहास का एकमात्र जीवन्‍त प्रतीक भ्रष्‍ट हो जाएगा जो अपनी आभा से न जाने कितने तुलसीजी और गॉंधीजी सरीखे व्‍यक्तियों को महात्‍मा बनाता रहा है।