18.12.07

श्री रामसेतु

श्री रामसेतु श्री रामसेतु का विषय अब उतना अनजाना नहीं रहा, जितना कि कुछ वर्ष पूर्व हुआ करता था। हिन्‍दू जिनके आराध्‍यदेव ही श्री राम जी हैं, वे भी इस विषय में इतने चैतन्‍य पहले नहीं रहे थे। कई बार होता भी है कि जब कोई वस्‍तु हाथों से जाने लगती है तब कहीं जाकर उसके महत्‍व का आभास होता है। नहीं तो अब तक ऐसा कब हुआ कि, जैसे छोटे-छोटे प्रसंगों से जुडे. स्‍थल तीर्थ बन गये और उनसे सम्‍बन्धित यात्राऍं आयोजित होने लगीं, वैसे ही कोई यात्रा रामेश्‍वरम् से लंका तक भी होती। खैर यह विषय धार्मिकों के लिए तो दु:ख का हो सकता है परन्‍तु धर्म के स्‍वरूप के लिए अनिवार्य नहीं। महत्‍वपूर्ण यह है कि भारतीय सरकार को ऐसा एकदम क्‍या हुआ कि यह इतना पुराना मानव एवम् प्राकृतिक इतिहास को समेटे हुआ यह पुल उन्‍हें एकदम से अमहत्‍वपूर्ण प्रतीत होने लगा। बजाय इसके कि लंका से अपने सम्‍बन्‍ध मजबूत करने के लिए वह स्‍वत:निर्मित इस पुल का पुनरुद्धार करवाती और भारतीयों और लंकावासियों के लिए व्‍यापार, संस्‍कृति के नये द्वार खोलती वह श्रीलंका की तमाम आपत्तियों के बाद भी इसे तोड.ने के लिए इतनी उतावली हो गयी। इस पर भी खास बात यह कि विश्‍वभर के प्रमुख वैज्ञानिक इस सेतुध्‍वंस के व्‍यापक प्राकृतिक, सामरिक, सीमायी हानियों के बारे में लगातार सचेत कर रहे थे। जब कोर्ट में इसे रुकवाने के लिए याचिका दायर की गयी तो उन श्रीराम‍जी को जिनसे भारतवंशी विश्‍वभर में अपने वंश को जोड़.ते हैं, उनके बारे में ही अपमानजनक टिप्‍पणियॉं सरकारी विभाग द्वारा की गयीं। विरोध का ऐसा अनुमान सरकार को नहीं रहा होगा अत: विरोध के प्रचंड रूप को देखते ही टिप्‍पणियों पर क्षमा मॉंगने के साथ ही ‘क्षतिपूर्ति’ के प्रयास प्रारम्‍भ कर दिये गये। हालांकि सरकार पुल के तोड़ दिये जाने के अपने निर्णय पर दृढ़ है। यद्यपि फिलहाल तो मा. न्‍यायालय ने ही तोड.-फोड. के विरुद्ध स्‍थगनादेश जारी कर दिया है। इन सब बातों और घटनाक्रम के बारे में समाचारों में बहुत कुछ आ चुका है परन्‍तु इन सबसे परे चिंतनीय बात यह है कि तमाम विकल्‍पों और व्‍यापक जनभावनाओं के बाद भी इस प्राचीन सेतु को तोड.ने के लिए सरकार का ऐसा दुरा्ग्रह क्‍यों है ? इसके संदर्भ में हम एक भिन्‍न तथ्‍य देखें। हम जानते हैं कि तमिलनाडु के ‘द्रमुक’ दल का स्‍थापना के समय से ही श्रीराम से विरोध अब तक जीवन्‍त रहा है। वहीं दिल्‍ली में बैठ कर सरकार चला रहे कॉन्‍वेन्‍ट स्‍कूलों में पढ़े. और अंग्रेजी में सोचने वालों की निगाह में इस देश का पुराना धर्म और उसकी पुरानी मान्‍यताऍं देश के निवासियों के लिए नितान्‍त अनावश्‍यक हैं। सम्‍भवत: देश की तरक्‍की इस के बिना उन्‍हें सम्‍भव भी नहीं लगती हो; उस पर वाममार्गी हैं ही, जो धर्म को अफीम से भी बढ. कर मानते हैं और शेष में समाजवादी, जिनकी सद्भावना भी रामजी और श्रीरामसेतु के लिए नहीं लगती। अब इस सेतु के तोडे. जाने को वोट की राजनीति के साथ ही 1857 की क्रान्ति के समय के तात्‍कालिक कारण से भी जोडें.। उस समय एनफील्‍ड रायफल के कारतूस के बारूद को नमी से बचाने के लिए उस पर गाय और सूअर की चर्बी से युक्‍त कागज उन कारतूसों पर लगाया गया था, जिसे कि भारतीय हिन्‍दू और मुसलमान सिपाहियों को दॉंतों से काटना होता था। गाय हिन्‍दू/आर्य के लिये ‘मइ्या’ है तो सूअर मुसलमान के लिए पवित्र। मुँह में इनका मॉंस कैसे लिया जाए? फिर या तो विद्रोह होगा या फिर चुपचाप जातीय चेतना का ह्रास सहना होगा। यदि यह युक्ति सरलता से स्‍वीकार कर ली जाए तो फिर तो भारतीयों पर से धर्म का बन्‍धन भी हट जाए और सहजता से धर्मपरिवर्तन, सेनाओं का विदेश भेजना (जो उस समय हिन्‍दू धर्म में धर्मविरुद्ध माना जाता था) या अन्‍य मनोनुकूल कार्य भी सरलता से सम्‍पन्‍न करवा लिए जाऍं। या‍नी आस्‍था के मर्मस्‍थलों को चोट पहुँचा कर धर्म की जीवनी शक्ति को कमजोर किया जाए ताकि प्राचीन धर्म व परम्‍पराओं की डोरियॉं कमजोर पड. जाएँ और देश ‘आधुनिक प्रगति’ और अन्‍तरराष्‍ट्रीय बाजार के लिए पूरी तरह अनुकूल हो जाए। ऐसा सोचना नितान्‍त नाजायज भी नहीं लगता। जब आर्थिक दृष्टि से सेतु काटने को अलाभकारी सिद्ध किया जा रहा है; रक्षा के हिसाब से भी खतरनाक बताया जा रहा है; समुद्री जीवन और पारिस्थितिकी के मापदण्‍ड पर भी यह खतरनाक है, ऐसा विशेषज्ञ कह रहे हैं; हजारों मछुआरे भी अपनी धार्मिक भावनाओं के साथ ही अपने आर्थिक जीवन के विनाश की आशंका से इसका विरोध कर रहे हैं; सीमाओं की असुरक्षा की बात भी कही जा रही है और तो और स्‍वयम् श्रीलंका इसे तोडे. जाने का विरोध कर रहा हो तो सवाल यह है कि इसे तोड़ा क्‍यों जा रहा है। कहीं ऐसा तो नहीं कि सर्वेश्‍वरों की कृपाप्राप्ति की अभिलाषा में कुछ ‘सेकुलर’ बेवजह ही इसे किये पर किये जा रहे हों। कुछ भी हो जैसे बामियान और बलूचिस्‍तान में तोड़ दी गयीं अनुपम बुद्धदेव की विशाल प्रतिमाऍं अब लौट नहीं सकती, वैसे ही यह श्री रामसेतु भी टूटकर फिर नहीं बनने वाला। अनुपम ऐतिहासिक, धार्मिक, प्राकृतिक विरासत के रूप की इसकी प्रतिष्‍ठा फिर कोई नहीं लौटा पाएगा। उस स्‍वर्णिम इतिहास का एकमात्र जीवन्‍त प्रतीक भ्रष्‍ट हो जाएगा जो अपनी आभा से न जाने कितने तुलसीजी और गॉंधीजी सरीखे व्‍यक्तियों को महात्‍मा बनाता रहा है।

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