18.12.07

सुधार

एक पिता ने अपने पुत्र को भी मूर्तिकला सिखाई। दोनों हाट में जाते और अपनी-अपनी मूर्तियॉं बेच कर आते। पिता की मूर्ति डेढ्-दो रूपये में बिकती, पर बेटे की मूर्तियों को आठ-दस आने ही मिलते। हाट से लौटने पर बेटे को उसका पिता उसकी मूर्तियों में कमियाँ बताता। बेटा अपने पिता की सलाह अनुसार ही काम भी करता। यही क्रम वर्षों चलता रहा। कुछ समय बाद बेटे की मूर्तियाँ भी पिता जितना मूल्य पाने लगीं। पिता ने भी उसी प्रकार शिक्षा प्रारंभ रखी। बेटा भी सुधार करता रहा। कला में निखार आता गया। मूर्तियाँ अब 5-6 रूपये में बिकने लगीं। परंतु पिता के उपदेशों का क्रम न टूटा। बेटा भी सीखता रहा। एक दिन झुंझुलाकर बेटे ने कहा 'मेरी मूर्तियाँ अब 5-6 रूपये में बिकती हैं जबकि आपकी डेढ्-दो रूपये में। कला भी मेरी आपसे अच्छी हो गयी है, अब तो मेरी कला में से दोष निकालना बन्द कीजिए।' पिता बोले - 'जब मैं तुम्हारी उम्र का था तो मुझे भी अपनी कला का अहंकार हो गया था, परिणाम यह कि मैंने अपनी कला में सुधार बंद कर दिया। तब से मेरी प्रगति रुक गयी और में दो रूपये से अधिक की मूर्तियाँ नहीं बना सका। मैं चाहता हूँ कि ऐसी भूल तुम न करो। अपनी त्रुटियों को समझने और सुधारने का क्रम जारी रखो, ताकि बहुमूल्य मूर्तियाँ बनाने वाले श्रेष्ठ कलाकारों की श्रेणी में पहुँच सको।

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